काश! मरण से पहले आप गुरु शरण में आ जाते,
जगत का संबंध त्याग गुरु से संबंध जोड़ लेते।
गुरु की शरण में मरण का भी मरण है,
भव से पार होने की मात्र यही शरण है।
कर्म क्षय करने का एक अद्भुत माध्यम,
गुरु शरण से पत्थर भी बनते परम।
श्वासें खत्म होते ही संबंध यही रह जाएँगे,
जो कुछ भी कमाया, दूसरे ही मौज मनाएँगे।
गुरु शरण को पाने तो देवता तरस जाते...
दोबारा ऐसा अवसर न जाने कब कहाँ मिले,
क्यों न इसी भव में संयम के बीज खिले।
जगत के लिए कितना भी करो, कुछ मिलने वाला नहीं,
संयम लेकर तो देखो, मिलेगा सब कुछ यही।
गुरु की शरण में ही सब कुछ है,
संसार में तो नश्वर ही सब कुछ है।
गुरु ही सच्चे सारथी, ले लो अविलंब शरण,
अतिशीघ्र मिट जाएँगे सारे भव-भ्रमण।
'हर्षित' विरले ही प्रेरणा पाकर जग जाते...
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