सच में...!
बहुत बदल गई हूँ
वक्त संभलने का नहीं मेरे पास
आज सुनाती हूँ कुछ ख़ास
एक चेहरा नहीं कई चेहरे हैं मेरे पास
तकलीफ बहुत है मुझे दूसरों से आज
यही सच्चाई है मेरी और तेरी 'ताज'
कल्पनाओं की दीवारें बनाई नई-नई
आज फुरसत कहाँ हैं मेरे पास
अपनों के पास बैठने की ओ मुमताज़
पत्थर दिल थी पहले भी मैं
ईंट-सी बनकर रह गई मैं आज
सच में...
गंगाजल सी शक्ति थी मेरे जीवन में
आनंद था पहले तन और मन मंदिर में
सोशल मीडिया में किनारा ढूँढ रही हूँ
आज कोई तो मिले समर्पण घूर रही हूँ
सच में...!
चंद्रकला सी बाज़ारों की शोभा हूँ
पंचामृत भी शरमाता है आने को
डर है भारी कहीं राह मैं सूख न जाऊँ
आकर ठहर गई आज झूठे से जंजालों में
लगा लिपिस्टिक होंठों पर महक रही हूँ
चमक दमक के साथ नयी सी बन गई हूँ
फेयर लवली लगा के थोड़ी संवर गई हूँ
बदली-बदली लगी आज मैं दर्पण में
सच में...
बहुत बदल गई हूँ
घनी घनी घनघोर घटाएँ घनन घनन करती हैं
केश किंग लगा के शबनम हनीप्रीत सी लागूं हूँ
कभी अपनों का सूरज बनकर खूब उम्मीद जगाईं
अब चिंता सी बनकर राख मलने लगी हूँ।
सच में...
कुछ भाव झरने बनकर बहने लगे हैं
वास्तविक से अवास्तविक रहने लगी हूँ।
कभी दिया की बाती बनकर जलती थी
आज सभा में अपनी अपनी धुनने लगी हूँ
सच में...
लक्ष्य-भेदी बाण हाथ से चलने को आतुर
दाद देने के बजाय बजट पर रोने लगी हूँ
गैस सिलिंडर महंगाई सी डरने लगी हूँ
पेट्रोल दादा शतक के मारे मरने लगी हूँ
रन आउट के डर के मारे दौड़ नहीं सकती हूँ
राहों पर चलते हुए गीत गुनगुनाती थी कभी
आज गुनगुनाते हुए अपनों को कोसने लगी हूँ
सच में बहुत बदल गई...
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