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कदम से कदम

                
                                                         
                            बड़ी दुष्कर लगती हैं राहें मगर,
                                                                 
                            
बचकर सबको रखना है हर एक कदम।
आये हैं जो गाँव में शहर से हम,
कर देना है खुद को सबसे अलग।
करके समाज से खुद को अलग,
चलकर निर्धारित नियमों पर हम,
खेलेंगे फिर अपने आंगन में तब,
जीतेंगे जब इस कोरोना से हम ।
घड़ी आई है सबकी परीक्षा की अब,

चलना है हमको मिलाकर कदम से कदम,
देखकर हमारा ये बढ़ता सितम,
खुदा भी खायेगा एक दिन हम पे रहम।
बरतेंग अगर सावधानियाँ हम,
कई रूपों को कर देंगे इसके दमन,
जीतकर के इस कोरोना से हम तब,
बचा सकते हैं अपने भारत को हम।
बड़ी दुष्कर लगती हैं राहें मगर ,
बचकर सबको रखना है हर एक कदम ।


सीमा यादव

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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