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दुआ है... कि वो हमारी खिड़की पर ही उतर आए!

                
                                                         
                            कोई चेहरा तो हो, जिस पर मेरी आँखें ठहर जाएँ,
                                                                 
                            
किसी की याद में मेरे भी दिन-रात संवर जाएँ...

तलाश-ए-शौक़ में हम भी भटकते हैं ज़माने भर,
कोई तो हो, जो इस वीरान रस्ते पर ठहर जाए।

हवा के साथ उड़ती हैं ये तन्हाई की बातें,
कभी ये पाँव रुक कर छाँव में मेरे भी ठहर जाएँ।

लोग ढूँढते हैं आसमान में जाकर कोई चाँद,
दुआ है... कि वो हमारी खिड़की पर ही उतर आए!

मुद्दतों से बुझी सी है ये दिल की बंजर ज़मीन,
कभी तो प्यार की बरसात से ये रास्ते तर जाएँ।
— हरिओम "सोनू"
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3 घंटे पहले

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