सागर-सा विस्तार है जिनका, पर्वत-सा आधार है,
मर्यादा की अंतिम सीमा, राम ही सत्य-आकार हैं।
न शस्त्र केवल हाथों में, न मुकुट का केवल मान है,
राम तो पावन चेतना की, एक दिव्य पहचान हैं॥
सत्य-धर्म पर अटल खड़े जो, संकट में भी धीर हैं,
दुष्टों का संहार करें जो, हरते सबकी पीर हैं।
न हार में जो डगमगाएँ, न जीत का अहंकार हो,
हृदय-कमल में हर पल जिनकी, भक्ति का संचार हो॥
अधर्म के घने तम में, जो प्रचंड सूर्य का प्रकाश हैं,
जन-जन के विश्वास में बसे, घट-घट में अविनाश हैं।
काल के भाल पर जो लिखें, शाश्वत विजय की गाथा,
उन रघुकुल-नायक के चरणों में, झुका हमारा माथा॥
— हरिओम 'सोनू
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