चट्टानों को चीर कर जो बही है, वो रवानी हूँ,
इसी पावन विंध्य धरा की एक अनकही कहानी हूँ।
रग-रग में जो उतर जाए, वो तेवर हूँ, वो पानी हूँ,
इस मिट्टी के कण-कण में, बस मेरी जिंदगानी है।
— तीरथ प्रसाद गुप्ता
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