आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

धड़कन

                
                                                         
                            ऐ दोस्त! कितनी मरतबा समझाऊं तुम्हें
                                                                 
                            
कि तुम मेरे दिल की धड़कन हो!
मेरी तनहाईयों की हमसफ़र हैं तुम्हारी यादें
तुम्हारे नखरओं का नाज़ उठता था
तुम्हें हर पल अपनी मोहब्बत का इतवार दिलाता था
ऐ मेरे बिछड़े चमन! मेरे जज़्बात थक चुके हैं
मेरे दिल को अब धड़कना गंवारा नहीं लगता
सांसें अब थम सी जाती हैं
ऐ मेरे दोस्त! कितनी मरतबा समझाऊं तुम्हें कि
अगर तुम नहीं तो आख़िर फ़िर कौन?
तोड़ दो अब अपना मौन

हरिकेश यादव काशी
हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर