नफ़रत करते-करते राख होने चले हैं
राख होने से पहले नफरत को ही राख बनादे
शायद आख़िरी हो ये मुलाक़ात अब,
गले लगके सारे शिकवे मिटा दें।
बहुत दूर तक चले हैं अहं के सहारे,
चलो आज ख़ुद को थोड़ा झुका दें।
जो दिल में बरसों के शिकवे बसे थे
उन्हें आँसुओं में बहाकर मिटा दें।
न जाने यहाँ किस मोड़ पर साथ छूटे
जो बचा है उसे इसी पल में सजा दें
जिद से कभी जीत हासिल ना होती
जिद को अभी आज नदी में बहादें
नफ़रत ने बनाई जो खाई दिलों में
उसे आज मुहब्बत से फिर से मिलादें
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