राजकोष से निकले हीरे,
जौ क्या उससे कमतर है?
रेजाणी की बूंदों के आगे,
फीके सात समुंदर हैं।
जिसकी प्यास बुझे जहां,
वही तो उसका सागर है।
खारे पानी से तो उत्तम,
मरुभूमि के धन की गागर है।
उजली धरती उजले लोग,
कैर- सांगरी छप्पन भोग।
सिर पर पगड़ी, हाथ में लाठी,
मूछों वाले हठीले लोग।
लोहा मानती दुनिया सारी,
दुर्ग मेहरान की परछाईं का।
दुर्गादास सा स्वामिभक्त,
जिसने मोल चुकाया पाई का।
सिर साटे रूंख रहे,
जिसने सबको पाठ पढ़ाया।
अमृता देवी के वचनों ने,
बिश्नोई कुल का मान बढ़ाया।
गूंज उठी खेजड़ली की माटी,
तीन सौ त्रिसठ शीश ढले।
पेड़ों की रक्षा खातिर,
वीर जहां हंस-हंसकर कटे।
-हरि मोहन जांगिड़
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