मैं हिंदी हूँ।
हिंद की जुबान हूँ, हिंदुस्तान की शान हूँ,
सभ्यता-सहजता की विश्व में पहचान हूँ।।
माटी की महक हूँ, जन-जन का सम्मान हूँ,
भारत के हृदय में बसती अमर जुबान हूँ।।
मैं हिंदी हूँ।।
हिंद की तरंग से हिमालय की छोर तक,
भावों के प्रवाह को सँभाले हर दौर तक।
तुलसी, कबीर, सूर, मलूक की मैं तान हूँ,
प्रेमचंद, जायसी, रहीम की उड़ान हूँ।।
मैं हिंदी हूँ।।
माँ की मधुर लोरी, आँगन की पुकार हूँ,
गाँवों की चौपालों में गूँजता विचार हूँ।
जन-जन के हृदय की सहज-सरल आवाज़ हूँ,
अपनों के बीच प्रेम का मीठा अंदाज़ हूँ।।
मैं हिंदी हूँ।।
बोली भले अनेक हों, भावों का मान हूँ,
भारत की विविधता में एकता की तान हूँ।
पूरब से पश्चिम तक, उत्तर से दक्षिण तक,
हर जन के मन में बसा अपना ही गान हूँ।।
मैं हिंदी हूँ।।
ज्ञान की उड़ान हूँ,
विश्व में बढ़ता मान हूँ।
साहित्य की शक्ति हूँ,
संस्कृति की शान हूँ।।
मैं हिंदी हूँ।।
अक्षर-अक्षर में भारत का अभिमान हूँ,
शब्द-शब्द में अपने संस्कारों का गान हूँ।
कल भी थी, आज भी हूँ, कल भी महान हूँ,
भारत की आत्मा की अमर पहचान हूँ।।
मैं हिंदी हूँ।।
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