ये पर्वत मालाएंँ
सिखाएँ हम को
हौसला ऊँचा
रखना ।
गगन चुँबी चोटियांँ
बतलाएँ
इरादे झुकने न पाए
विचरण करे
उतुंग शिखर पर
आगे बढ़ते जाएँ ।
ये वादियांँ
ये मुधर हवाएँ
गमछा खींच
मुझे ले जाएँ ।
मैदानी मिट्टी का
सुरमा
घाटियों से मिलते
जाएँ
देवदार की
छांव तले
कुछ पल अभी
बिताएँ ।
शिला टाप
से नीचे उतरें आओ याक
चराएँ
याकों के भी
भरे झुण्ड मे
कुछ कदम
बढ़ जाएँ।
ये पर्वत
मालाएँ हम को
प्रतिदिन कुछ
सिखलाएँ ।
ले ना जाएँ
ऊपर कचरा
स्वीटजरलैण्ड
बनाएं
प्रदूषण से
मुक्त वादियांँ
हरियाली में जश्न
मनाएँ ।
ये वादियांँ
ये घाटियांँ
ये ऊंची पर्वत
चोटियांँ
अमूल्य धरोहर
भारत मां की
आओ इसे बचाएं
आओ याक
चराएँ ।
ऊंचे उठते
जाएँ
देवदार को
अभी बचाएँ
-हंसनाथ यादव
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