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लोकतंत्र की केंचुल

                
                                                         
                            लोकतंत्र पर
                                                                 
                            
जो राजतंत्र
की केंचुल चढ़
गई है
उसे हटाने में
तिलचट्टे
एक कदम आगे
बढ़ गए हैं ।
आक्रोश में
संसद की
सीढ़ियों पर
चढ़ गए हैं ।
दे दिए हैं
चुनौती
सांसद और
स्वतंत्रता को और बता दिए हैं जनता को कि लोकतंत्र को
हाई जैक नहीं किया
जा सकता
सामंतवाद की
प्रयोगशाला
से निकले
रसायन
लोकतंत्र का
अपरदन कर
रहे हैं अब
भी।
कैसे मैं
कहूं कि यह
लोकतंत्र मेरा
है
कहां सवेरा है?
यह जो लोकतंत्र
है मेरा नहीं है
यह तो ठूँठा पेड़
इस पर चीटियों
का बसेरा
नहीं है।
 
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एक महीने पहले

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