मेरे भी
अपने शब्द
हैं
जिनके मेल
को अब तक
वाक्य नहीं
कहा गया है।
अनचिन्ही
आवाजों में
ये दबे हुए
हैं अब भी
पक रहे हैं
अपेक्षित तापमान
पर धीरे-धीरे
नहीं कर सकते
खामोश इनको
ये भी अखबार
की कतरनों में
स्थान पाएंगे
जिस दिन हम धड़ल्ले से
कुछ बोल
पाएंगे या
संसद से
कुछ लकड़बग्घे निकल
जाएंगे
एक दिन ये
बनेंगे एक
दमदार वाक्य
और जेल के
सीकचे तोड़कर
बाहर आएंगे ।
रचयिता -
-हंस नाथ यादव
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