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क्षत-विक्षत घाव जब टीस भरते हैं

                
                                                         
                            क्षत-विक्षत घाव जब टीस भरते हैं,
                                                                 
                            
न मिलने वाले की आह भरते हैं!
जिंदगी के सफर में तन्हा हम,
उस अजनबी को रोकर याद करते हैं!
जो गर मिलता तो जिंदगी कुछ और होती,
छांव तो छांव,धूप भी धूप न होती!
मन पंछी बन सपनों के गाँव उड़ता,
दुख ग़म मुसीबत और न होती जड़ता!!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
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