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घोड़ों पर जिनका दिन गुजरा था।

                
                                                         
                            घोड़ों पर जिनका दिन गुजरा था।
                                                                 
                            
घोड़ों पर जिनकी रात गुजरी थी।

गुफा जंगलों में रहने वाले थे वो।
हल्लों की रोज बारात गुजरी थी।

खालिस राज का किस्सा बने वो।
वायदों से भरी प्रभात गुजरी थी।

कहां से आते किधर से आ जाते।
दुश्मनों पर करते घात गुजरी थी।

हक्के बक्के थे जुल्म करने वाले।
हर युद्ध में मिली मात गुजरी थी।

सोहल छापा मारी का समय था।
बारह बजाने की बात गुजरी थी।
-गुरदीप सिंह सोहल
 
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एक महीने पहले

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