" मैं किस शहर का सफर करू "
मैं बेटी किसी की, शर्मसार बहुत होती हूँ
मैं कभी "बीकानेर" कभी "मुनिरका" में ,
तो कभी मंडसौर तो कभी जम्मू-उन्नाव में ,
शर्मसार अगर मैं होती ही रहूं
बताओ मैं किस शहर का सफर करूँ ?
मैं बेटी किसी की थी
नाम व इज्जत किसी की थी ,
न निर्भया न आसिफा बनना है ,
जान जो जिस्म से चली जाए
बताओ मैं किस शहर का सफर करूँ ?
मैं बेटी किसी की रहती मगर
मैं जिस शहर भी जाती हूँ
पलको पे बिठाने के बहाने लूटी जाती हूँ ,
दरिंदे ही दरिंदे मिलते है हर जगह
दागदार होकर भी मैं क्या करूँ ?
बताओ मैं किस शहर का सफर करूँ ?
ना भाई मिलता है ना साथी
अजनबी भी मिलते है दरिंदे बनकर ,
शायद कोई जगह भी न है सुकून की ,
बैइज्जत हर कोई करे तो बताओ
मैं किस शहर का सफर करूँ ।
सूनसान हो गया है हर शहर का सफर
न करता कोई महिलाओं की कदर ,
मैं किस-किस जगह भीख मांगूँ ,
बच नही पाती जब इज्जत घर की दीवारों से
तो बताओ मैं किस शहर का सफर करूँ ?
भूख जब तक न मिटे तेरी इंसाँ
सुनसान आँचल में तू मुझे नोचता रहै ,
कब तक तू न बनेगा पिता किसी बेटी का
या फिर सूली पर तू झूलता रहे ,
कुछ तो होगा मेरी मौत से दरिंदो में गम तो बताओ मैं किस शहर का सफर करूँ ?
- गुड्डू सिकंद्राबादी
Writed on : 09/07/2018
Topic on : safar
#MereAlfaz
आप जानते है कि आज कल हर न्यूज़ चैनल बलात्कार की घटनाओ को लेकर चर्चा में रहता है और ऐसा कोई शहर नही बचा जहां दरिंदो ने किसी की बहन बेटी को शर्मसार न किया हो उसी को ध्यान में रखते हुए लिखा है मैं किस शहर में सफर करू
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