वो चुप है मगर ख़ामोश नहीं
आँखों में पूरा आसमान लिए
घर की ज़िम्मेदारी है हाथों में
है दिल में अपनी उड़ान लिए
वो पैदा हुई तो डॉक्टर ने कहा
आपके घर में लक्ष्मी आई है
मगर न जाने मैने सुना कि
काश बेटा हुआ होता तो अच्छा होता।
बस यहीं से
उसकी कहानी के दो चेहरे बन गए
एक, जिसपे समाज के तौर तरीके थोप दिए गए
और दूसरा
जिसे हर क़दम पर ख़ुद को साबित करना पड़ा।
उसमें घर की लख्मी दिखी, दुर्गा तो कभी परी दिखी
पर जब उसने आसमान देखा और उड़ने का ख़्वाब देखी
तो दुनिया ने उसके हौसलों के पंख नहीं देखे,
वो अपनो से सवाल भी करती तो कैसे
क्योंकि उसे बचपन से सिखाया गया
कि अच्छी बेटियाँ बहुत सवाल नहीं करतीं।
मगर उसके भीतर
एक आवाज़ थी
जो हर रोज़ कहती थी,
“मैं सिर्फ़ किसी की बेटी नहीं,
मैं भी एक इंसान हूँ,
मेरे भी सपने हैं
उसने माँ की थकान देखी,
पिता की फ़िक्र समझी,
भाई की आज़ादी देखी,
और फिर भी
अपने हिस्से की उम्मीद बचाए रखी
जब वो हारी तो दुनिया के तानों के बीच छोड़ दिया गया
जब वो जीती तो किसी और के नाम से जोड़ दिया गया
वो गिरी भी, छुप छुप कर के रोई भी
मगर हर बार, अपने आँसू पोंछकर फिर खड़ी हो गई
क्योंकि बेटी होना कमज़ोर होना नहीं है,
बेटियां हर परिस्थिति में जीना सिखाती है
बेटियां ही तो दुनिया को दुनिया बनाती है
इस समाज में जीना इतना भी आसान नहीं
तो उसे इतना मज़बूत बनाना है
कि वो अपने फ़ैसले ख़ुद ले सके।
उसे इतना भरोसा देना है
कि दुनिया चाहे जितनी बार कहे
“तुम नहीं कर सकती,”
पर वो मुस्कुराकर कह सके
“मैं कोशिश करूँगी,
मैं सीखूँगी,
मैं गिरूँगी तो उठूँगी,
मगर अपने सपनों से
समझौता नहीं करूँगी।”
बेटी सिर्फ़ घर की रौनक नहीं,
वो एक पूरी कहानी है
जिसमें बचपन है,
ज़िम्मेदारियाँ हैं,
आँसू हैं,
सवाल हैं,
सपने हैं,
संघर्ष हैं
और सबसे ख़ूबसूरत
उस कहानी का आख़िरी पन्ना
समाज नहीं,
खुद एक बेटी है।
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