न मैं रो सका हूँ, न कोई रुलाए,
ग़ज़ल है, जो हर ज़ख़्म को गुनगुनाए
सहर से जो पहले थे ख़ारों के साए,
उन्हीं ने चमन के दिये भी बुझाए
वो चाँदसिफ़त थी, मगर टूट बैठी,
हवा ने जिसे आसमाँ से गिराए
जो दरिया थे ख़ुद में ही मग़रूर इतने,
वक़ारों को उनके किनारे दिखाए
मैं जन्नत की सीढ़ियाँ गिनता रहा था,
मगर ख़्वाब थे, ख़्वाब ही रह न पाए
किताबों के पन्ने थे ख़ामोश लेकिन,
फ़साने किसी ने थे उनमें लिखाए
"गोविन्द" तेरा ग़म भी इक दास्ताँ है,
जिसे दर्द पढ़ते हैं, आँसू बहाए !!
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