ऋण सारा है शीश पर, जानत सकल जहान।
श्रद्धा से तर्पण करें, पावन मुक्ति-विधान॥
पावन मुक्ति-विधान, तृप्ति पावें सब पूर्वज।
बहाई अमृत धार, मिटें कुल के सब दुरभज॥
कह 'गोकुल' कविराय, खुला सुख का शुचि द्वारा।
मेटें तीनों ताप, उतर जाए ऋण सारा॥१॥
तर्पण तिल-जल से करें, कुशा हाथ धरि लेव।
पंचयज्ञ का भोग दै, तृप्त होत पितृ देव॥
तृप्त होत पितृ देव, श्वान गौ काक जिवाएँ।
दीन-विप्र घर आनि, मोद सों अन्न खवाएँ॥
कह 'गोकुल' कविराय, करहु मन से शुचि अर्पण।
तजि तामस सब भाव, करै पितरन को तर्पण॥२॥
पूर्वज प्यारे कुल-धनी, तिनकी पावन देन।
संस्कार हमे है मिले, पाये सुख अरु चैन॥
पाये सुख अरु चैन, दया सब जीवन धारें।
तजि मिथ्या अभिमान, सादगी अंतर सारें॥
कह 'गोकुल' कविराय, धरम-मर्यादा धारे।
सीख दया की देहि, सदा ही पूर्वज प्यारे॥३॥
-गोवर्धन बिसेन 'गोकुल'
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