कभी चिठ्ठी कभी राखी, मनीऑर्डर कभी आते,
पुराने दिन मजे के थे, खुशी भी डाकिया लाते |
खड़ी बाजू किनारें में, अकेली पत्रपेटी अब,
न कोई देखता उसको, न कोई हाल पुछ पाते ||१||
कभी चिट्ठी, कभी ख़त से, मनों में दीप जल जाते,
कभी दुःख बाँटते अक्षर, कभी सुख साथ ले आते |
लिखे जो प्रेम की पाती, सँजोकर लोग रखते थे,
बिना बोले वही पन्ने, बड़ी बातें सुना जाते ||२||
जमाना फोन का आया, हुआ संदेश अब सस्ता,
मगर वो याद का झोला, हुआ भारी वही बस्ता |
लगी है जंग लोहे पर, खड़ी चुपचाप रोती है,
भला संदेश का अब तो, कहाँ है पूर्व सा रस्ता ||३||
प्रतीक्षा जो सुखद होती, कहाँ वो अब यहाँ मिलती,
हृदय के तार छेड़े जो, न वैसी भावना खिलती |
न उसमें गंध मिट्टी की, न अपनों की छुअन कोई,
मशीनी दौर की लहरें, मनों को आज है छलती ||४||
समय के चक्र ने छीना, पुराना वो मधुर सावन,
लिखे जो हाथ से अक्षर, लगे वो आज भी पावन |
कहे 'गोकुल' सुनो दुनिया, पुरानी याद मत खोना,
हृदय का प्रेम ही होता, हमेशा श्रेष्ठ अरु पावन ||५||
-गोवर्धन बिसेन "गोकुल"
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