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बेरोजगारी

                
                                                         
                            न लिखूं कुछ कैसे भला,ये कर्जबाजारी देखकर,
                                                                 
                            
झकझोर देती है कलम भी,इनकी लाचारी देखकर।
मैं भी देखूं क्या अब तमाशा,तमाशबीनों की तरह
मर चुका हो जल आंखो का,उन चक्षुविहीनों की तरह,
क्यों न कहूं औरों के जैसे,इनकी मक्कारी देखकर
दवाग्नल सी जो भड़की जाए,वो बेरोजगारी देखकर।
हद हो गई अब तो जागो तुम,कुंभकर्णी सुप्तावस्था से,
मांग रहा है युवा रोजगार, लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था से।
चेता रहा हूं बार बार मन में,पनपती उद्गगारी देखकर,
बदल न जाए ज्वाला में जो,वो सुसुप्त चिंगारी देखकर।
दवाग्नल सी जो भड़की जाए,वो बेरोजगारी देखकर
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2 वर्ष पहले

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