आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

रूठ गई कविता

                
                                                         
                            न जाने क्यों अब ,
                                                                 
                            
पंक्तियों में शब्दों का ,
सुहस्तक्षेप न रहा,
कविता बन ही जाती थी,
सुयोग अब ऐसा न रहा..
न जाने क्यों अब,
सारे सच अब भी अधीर हैं,
उठ रहे मनोभाव वैसे ही,
नहीं ठहर रहा बहाव भाव,
फिर न जाने क्यों अब,
सज नहीं रही पहले सी,
अलंकार भी हैं, रस भी हैं,
फिर न जाने क्यों अब ,
श्रृंगार कर नहीं रही,
कविता अब बन नहीं रही...
विषमता में डूबी कलम थी,
तब भी सोम ही छलकता था,
सुधा पान अब कराता हूं,
फिर क्यों तुम लेखनी ,
अब वैसी चल नहीं रही,
कहीं ऐसा न हो कि कविता,
तुम ही तो रूठ नहीं गई...
- गिरीश इंदौरकर' हमराही '
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर