कंचन, कामिनी और काया , ये तीनों हैं माया की छाया ।
कहै कबीर सुनहु धरमनि , छुटिहें जब मिलि गुरु की दया ।।
अपनी अपनी धुन में , बजाबे सब अपने साज-ओ-बाज ।
रहिमन लहरी प्रेम में , निकले एकहि सूर एकहि आवाज ।।
ऐहि जीवन जंजाल में , काल फेंके अपना जाल-ओ-पाशा ।
जो करे सुसंगति रहे सत्संग में , वही बचिहें कहे संत रैदासा ।।
इस स्वप्निल संसार में , जीव करता हाट-बाजार ।
पलटू संग 'गिरिजा' कहै , साधो आचार-विचार ।।
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