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अजीब रिश्ता

                
                                                         
                            अजीब है इस जगत में रिश्ता , इंसान और भगवान का।
                                                                 
                            
भगवान बनाता इंसान को ; इंसान गढ़ता मुर्ति भगवान का।।
चढ़ाता जो कुछ मुर्ति पर , ब्याजमय उसे वापस मांगता है।
गरीबी में है ईश्वर का वास ; गरीब चाकर है धनवान का।।
कौन है सच्चा कौन है झूठा , लगता है सभी गोरखधंधा।
निर्दयी सब शासन करते ; शोषण होता है दयावान का।।
कदम-कदम पर बेईमानी है , चलती है खूब हरामखोरी।
कहै 'गिरिजा' तू निष्ठा कर ले , अभी भी पूछ है निष्ठावान का।।
अजीब है इस जगत में रिश्ता , इंसान और भगवान का।
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एक महीने पहले

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