बेख़ुदी में बैठे हम परेशान हो गए
आपके निशान को ढूंढते बेजान हो गए
सोचते थे हम भी कुछ कर गुज़र जाएँगे
आप ही के ज़ख़्म से उभर भी हम जाएँगे
आप भी गए वो ख़याल भी गया
रातों की नींद से वो सवाल भी गया
मैं सोच के भी ख़ुद को कुछ न कह सका
मैं हार भी गया और जीतता रहा
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