आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं हार भी गया और जीतता रहा

                
                                                         
                            बेख़ुदी में बैठे हम परेशान हो गए
                                                                 
                            
आपके निशान को ढूंढते बेजान हो गए
सोचते थे हम भी कुछ कर गुज़र जाएँगे
आप ही के ज़ख़्म से उभर भी हम जाएँगे
आप भी गए वो ख़याल भी गया
रातों की नींद से वो सवाल भी गया
मैं सोच के भी ख़ुद को कुछ न कह सका
मैं हार भी गया और जीतता रहा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर