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जीवन के दोहे

                
                                                         
                            मोय-मोय करत-करत,उमर गयी है बीत।
                                                                 
                            
मोय कतई छूटत नहीं, भरी पडी है प्रीत।।

उमर सारी जब निकल गई, नाम लिया नहीं ईश।
मरण घड़ी जब आय गई, तो क्या करें जगदीश।।

वन उपवन गया नहीं, और न गया गिरीश।
घर बाहर करत-करत, निकल आई खींस।।

करि सकै तो करि लै, भक्ति ईश बस होय।
पछितातै रहि जायेगो, नहि सुनेगा कोय।।

श्री -श्री करत-करत, उमर हुई पैंतीस।
गठरी श्री की न पावगो, रगड डालो चाहे शीश।।

मोह-माया के संसार में, फंसो रहेगो जोय।
कछु न अपना पावगो, क्या तोय क्या मोय।।

वंदना त्रिपाठी
चित्रकूट
 
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4 वर्ष पहले

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