बाहर खुला आसमान है,
जी सकती हूँ मैं खुलकर,
ले सकती हूँ सांसें अब मैं जी भरकर।
चाहूँ तो उड़ सकती हूँ मैं अब बहुत दूर,
उड़ सकती हूँ नीले गगन के उस पार।
जंजीरें भी तो नहीं हैं अब पैरों में मेरी,
फिर भी... न जाने क्यों उड़ नहीं पा रही हूँ।
शायद आदत सी हो गई है बंद दीवारों में कैद रहने की,
पंख तो सलामत हैं, मगर बेजान सी रह गई
चाहकर भी अब में उड़ना भूल गई
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