बारिश की बूंद
आज बारिश की बूंदों को लटकते देखा
पेड़ की पत्ती पर
नीम की डाली पर
गुलाब की पन्खुड़ी पर
रस्सी की डोरी पर
झूले की रस्सी पर
बिजली की तार पर
लोहे की राड पर
अपने बालों की लटों पर
अपनी आँखो की पलकों पर
ओह! वाह ! मेरे लबों पर
अरे..अरे ये तो मेरी हँसी पर भी
और देखो.. वो वो ...वो
बच्चों की खुशी पर
चमेली के फूलों पर
अरे! किसी की याद में
चेहरे के गालों पर
आँसू से हिलमिल कर
बूंदों को लटकते देखा
जी हाँ..मैने आज बारिश की बूंदों को
मचलते देखा
टपकते देखा
हवा के झोंके को भिगोते देखा
झोंके को शीतल करते देखा
यह बूंदें कुछ देर की मेहमान है..
फिर कब आएगी..?
यह जाने बिना
अभी इसे अपने साथ मिलने दो
अपने लबों की हँसी को खिलने दो।
गीता शर्मा सूद
गीता 'मुस्कान'
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