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जिसे मंजिल समझा था,वही रास्ता निकला

                
                                                         
                            हर तरफ़ भीड़ थी, फिर भी अकेला निकला,
                                                                 
                            
जिसे अपना कहा था, वही फ़ासला निकला।

दिल ने जिस नाम को सजदा समझ कर रखा,
वक़्त आया तो वही दर्द का सिलसिला निकला।

हमने चाहा था जिसे रूह की राहत समझें,
उसकी यादों का मगर ज़ख्म ही गहरा निकला।

धूप में खड़े रहे उम्र भर उसके लिए,
उसके हिस्से का मगर साया किसी और का निकला।

अब न शिकवा है कोई, न कोई गिला बाकी,
जो मिला दर्द में, वो ही मेरा सहारा निकला।

लौटकर देख लिया मैंने कई बार मगर,
जिसे मंज़िल समझा था, वही रास्ता निकला। 
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2 महीने पहले

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