आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जूने घर की खिड़की..

                
                                                         
                            जूने घर की खिड़की हो गया है दिल मेरा,
                                                                 
                            
जब तेरी हवा आती है, कुंडी काम नहीं आती।

तेरे किस्से सुन-सुन कर ढह गई दिवारे ... ,
तेरे सामने बैठे एक भी कलाम (बात) नहीं आती।

मोहब्बत की है... , बस मुझको मोहब्बत समझ आती है,
दुनिया समझ नहीं आती.. मुझे निज़ाम (नियम-कायदा) नहीं आती।

जिस शाम होती है तलब तुझसे मिलने की,
दिन नहीं ढलता और शाम नहीं आती।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 hours ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर