जूने घर की खिड़की हो गया है दिल मेरा,
जब तेरी हवा आती है, कुंडी काम नहीं आती।
तेरे किस्से सुन-सुन कर ढह गई दिवारे ... ,
तेरे सामने बैठे एक भी कलाम (बात) नहीं आती।
मोहब्बत की है... , बस मुझको मोहब्बत समझ आती है,
दुनिया समझ नहीं आती.. मुझे निज़ाम (नियम-कायदा) नहीं आती।
जिस शाम होती है तलब तुझसे मिलने की,
दिन नहीं ढलता और शाम नहीं आती।
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