के मेरे मरने के बाद मुझे दफनाना नहीं
मैं नहीं चाहता के दो गज जमीन मेरे नाम हो जाये
अगर हो सके तो मुझे जला देना
ताकि ये अहंकारी शरीर जलकर राख हो जाये
और हा मेरे राख को नदी या नालों में बहाना नहीं
मैं नहीं चाहता के उस राख से नदी का जल दूषित होके बर्बाद हो जाये
अगर हो सके तो उस राख को गाय के गोबर के साथ मिला देना
ताकि उसकी खाद्य से पौधों का विकास हो जाये
और हा ये सोच के कभी घबराना नहीं के अस्थी विसर्जन न किया उसकी आत्मा भटकती रहेगी
अरे आत्मा तो उनकी भटकती है जिनके ख्वाब अधूरे हो
पर मैंने तो ओ सारी उम्र जी ली जो मेरे लिए जरूरी थी
और ओ सारे ख्वाब भी पूरे कर लिए जो कभी देखे थे
अब जा रहा हूं तो बस उन यादों को लेके
जिनके लिए मैं आया था.....।
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