तुझे शहरों का नज़ारा मुबारक है,
हमें अपना गाँव प्यारा मुबारक है।
वफ़ा की तलाशी में थकते रहे तुम,
तुझे फिर नया इक सहारा मुबारक है।
दिलों से दिलों का मिलाना था तमाशा,
हमें दर्द का ये इशारा मुबारक है।
शहर की ये राहें, ये बेचैनियाँ भी,
तुझे रात-दिन का गुज़ारा मुबारक है।
मेरी शराफ़त को ठुकरा के हँसना,
तुझे अपना हर इक नज़ारा मुबारक है।
कहा था कि हमको वो हासिल न होंगे,
हमें तेरी आँखों का तारा मुबारक है।
न उधार के रिश्तों से दिल को सजाएँ,
तुझे शहर—हमें गाँव हमारा मुबारक है।
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