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रे पथ के पथिक तू आबाध गति से चल

                
                                                         
                            रे पथिक! तू अबाध गति से चल.…...
                                                                 
                            

*रे पथ के पथिक! तू अबाध गति से चल,*
ना हो निराश अकिंचन, कुछ बाधाओं से।

*मन को ना मार, जीवित है तू,*
तेजस्वी है तू, ओजस्वी है तू।

पथ में पाषाण हैं, कंटक हैं, गर्त हैं,
पर तेरे चरणों में तो अटल शौर्य का व्रत है।

विध्नों की गर्जना से क्यों भयभीत है?
तेरे भीतर तो अनन्त शक्ति का गीत है।

आत्म-गौरव को सुन, आत्म-दीप से जल,
अज्ञान-तिमिर को चीर, तू प्रज्ज्वलित हो चल।

उत्थान-पतन तो जीवन के सोपान हैं,
धीर-वीर ही तो सच्चे परित्राण हैं।

*रे मन! तू मत हार, तू ही तो सार है,*
*तेरी ही ज्वाला में, सृष्टि का प्रसार है।*

चल, अबाध चल, अविराम चल,
लक्ष्य-संधान तक, तू संग्राम चल।
-गौरव कुमार तिवारी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
47 मिनट पहले

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