चंद्रघटा की लहरों में मेरे मन का श्रृंगार हुआ,
बिंदिया, लाली, सूरमा, पाँजेब का भी अधिकार हुआ,
सजी धजी सी पालकी में जी जाकर विराजमान हुआ,
कभी छलक कर गगरी में देखता है,
कभी उचक कर बदरी में देखता है,
सवारी निकलने समय सब जगह हाहाकार हुआ,
अंदर पालकी में बैठा मन जाने कब फरार हुआ!
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