ये बता कर जाना कि, फ़िर कब मिलोगी
दूरी कुछ संग मेरे तय, तुम कब करोगी
पूर्णता जब तुम हो मेरी, तो किसी से क्या कहूँ
इस जहां से, कब तलक, यूँ ही डरोगी.
मंजिले-ज़ाना हो तुम अब, और मैं क्या ही कहूँ
इस ज़माने के सितम अब, और कितना मैं सहूँ
आ भी जाओ पास मेरे, अब नहीं लगता है जी
क्या गिला मैंने किया, जो बिन तुम्हारे मैं रहूँ
तुम हो मेरी, मैं तुम्हारा, बात मेरी मान लो
दिल जो मेरा है, तुम्हारे पास, उसको थाम लो
कब गुज़र जायेगा ये पल, दो घड़ी की जिंदगी
कल रहूँ या ना रहूँ मैं, बात इतनी जान लो
दोनों चलते हैं न मिलकर, इस जनम और उस जनम
साथ छोडूंगा ना मैं, मुझको ख़ुदा की है कसम
तुम बनो मेरी कि, मुझको और क्या ही चाहिए
जी न पाऊंगा मैं तुम बिन, अब नहीं कोई भरम
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