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फ़िर कहीं मिलैं

                
                                                         
                            मैं, मंजुला और जवानी का वो कालखंड
                                                                 
                            
गर्मी, बारिश या कड़कती ठंड

उसके साथ बिताये वो मीठे पल
दिन जैसे भागता था, रातें जाती थी ढल

उसके बालों की लटैं, सादगी और मीठी मुस्कान
सोचा नहीं था, बच पायेगा ईमान

पर एक दूजे के लिए नहीं बने थे हम
कुदरत के आगे तो हम सभी हैं बेदम

वो नही है, पर साथ हर वक्त रहती है उसकी याद
क्या पता, फिर कहीं मिलैं, और हो जाऐं आबाद
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2 महीने पहले

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