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मुसलसल दर्द जो पाले हुए हो

                
                                                         
                            ग़ज़ल
                                                                 
                            

मुसलसल दर्द जो पाले हुए हो,
इधर लगता है कुछ काले हुए हो।

फ़क़ीरों वो नगर बहरा बहुत है,
जहां डेरा अभी डाले हुए हो।

निहां थे मुद्दतों जिस दिल में साहिब,
उसी दिल पर अभी छाले हुए हो।

हमेशा एक कोलाहल बपा है,
हमारी रूह के नाले हुए हो।

ये सांसें मुनहसिर हैं वस्ल पर उस,
जिसे मुद्दत से तुम टाले हुए हो।

नहीं लेता कभी मैं नाम तेरा,
ज़ुबां पर तुम मेरे ताले हुए हो।

नहीं दिखता मुझे अब साफ़ बिल्कुल,
नज़र की ग़ैर तुम जाले हुए हो।
-अनुराग मिश्र ग़ैर
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3 महीने पहले

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