जो कभी दूर था, उसे बहुत पास से देखा है,
मैंने वक्त को इतने ऐतबार से बदलते देखा है।
बदल गई हैं राहें, बदल गया है ज़माना,
क्योंकि अब सबको है सिर्फ पैसा कमाना।
दौड़ रहे हैं सब यहाँ एक अनजानी सी रेस में,
इंसान घूम रहा है अब इंसानियत के भेष में।
भूल गए हैं कि कफ़न के साथ नहीं जाता कोई खज़ाना,
फिर भी जुटे हैं सब सजाने में अपना आशियाना।
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