जो सियासत यहाँ पे करते हैं,
देशद्रोही हैं, देशपाल कहाँ।
हर गली पूछती है रो-रोकर,
देशद्रोही हैं, देशपाल कहाँ॥
हर तरफ़ शोर है वफ़ाओं का,
झूठ बिकता है सिर्फ़ दावों का।
सच की राहों में धूल ही धूल,
देशद्रोही हैं, देशपाल कहाँ॥
ताज पहने हुए लुटेरे हैं,
राज,शासन के क्रूर डेरे हैं।
भूख रोती है गाँव-गाँव में अब,
देशद्रोही हैं, देशपाल कहाँ॥
कुर्सियों के सभी पुजारी हैं,
स्वार्थ की ही नई सवारी हैं।
जन की पीड़ा न सुनने वाले ये,
देशद्रोही हैं, देशपाल कहाँ॥
मुल्क बिकता रहा तमाशे में,
सच अकेला रहा निराशे में।
कौन रक्षक बने वतन का अब,
देशद्रोही हैं, देशपाल कहाँ॥
उठ खड़े हों वतन के सब लोगो।,
अब न रहना यूँ मौन ही लोगो।
अब पुकारे ये दिल मेरा रोकर,
देशद्रोही हैं,देशपाल कहाँ॥
-नवनीत कृष्ण
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