ना तो ग़ुरबत में ही रखे ना वो फ़रज़ाना करे|
उसको दीवाना ही करना है तो दीवाना करे।
जिंदगी करती है कर दे मुझे रिंदों में शुमार,
मौत चाहे तो मेरे क़ल्ब को पैमाना करे।
शोर ही शोर है अंदर मेरी ख़ामोशी में,
जी मेरा चाहे तेरा बज़्म में अफ़साना करे।
जब किसी से भी नहीं होती हुकूमत दिल पर,
कोई दिल ले के मेरा, यार को नज़राना करे।
हँस के सह लेंगे मोहब्बत में जो आए भी सज़ा,
दिल धड़कने का कोई चाहे तो जुर्माना करे।
एक अदना सा मुलाज़िम हूँ क़लम का मैं भी,
अब सुख़न-गोई से इतना भी न बेगाना करे।
मीर-ओ-ग़ालिब भी नहीं, जौक़-ओ-सौदा भी नहीं,
वो मुझे सिर्फ़ मेरे नाम से पहचाना करे,,
-एजाज़ अहमद
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