आधुनिक शिक्षित समाज में फैली बेरोजगारी,
डिग्रियां अलमारी में बेकार पड़ी हैं सारी।
योग्यता और दक्षता से मिलता नहीं काम अब,
जान- पहचान, रिश्वत से भरी हैं जगह सारी।
पढ़े- लिखे घूम रहे नहीं मिल रही नौकरी,
अपने स्तर का काम न मिलने से छा रही उदासी।
उच्च शिक्षा प्राप्त करके भी तलाश रहे नौकरी।
गंभीर मुद्दा है ये इस पर नहीं किसी का ध्यान।
कितना कमाए, कितना बचाएं सब हैं परेशान।
सारे स्वप्न पूरे कर पाएँ, इतनी अब कमाई नहीं,
अमीर- गरीब का फर्क बढ़ गया, पूछे भाई, भाई को नहीं।
न जाने कब ये समस्या दूर होगी।
कब वो दिन आयेगा जब बेरोजगारी दूर होगी।
रिया दुबे
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