खिलखिलाती सी तेरी वो ‘हसीं’
गूँज रही है मेरे मन में,
जब से तू आयी है...
'जीवन' “मेरा” महक उठा है!
तेरे आने से, पूरी हुई “मैं”,
“मेरा” रोम रोम पुलकित हुआ….
महक उठा है घर आंगन!
जी कर करता है, लेकर जाऊं
इस दुनिया से दूर तुझे “मैं”,
“डर” लगता है, खो न जाए
सरल सुकोमल बचपन ‘तेरा’!
“काश” की होती साथ सदा “मैं”,
आँखों से न ओझल करती,
रखती सदा महफूज तुझे मैं,
तुझपर सब न्योंछावर करती!
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