कुर्सी डट्ठी आओ बैठो
और सुनाओ लाला जी
चाय चुक्को मूँह नू लाओ
ख़ाली करो प्याला जी
नाती पोते हो गए वड्डे
अपने अपने कम्मी जाँदे
घर पर वेले रहते होगे
जपते होगे माला जी
और सुनाओ लाला जी
और बताओ,फिर रेट बढ़ गए
तेल गैस और खाण पीण के
कैसी रही दीवाली अपनी
या फिर निकला दिवाला जी
और सुणाओ लाला जी
चीनी शक्कर बस में न रही
डायबिक वाली गोली चलती
डेली लगता टीका एक
चाय पीण की चाह ही मुक गयी
दुध नू आया उबाला जी
चारे पासे इक ही रोना
मँहगायी ने कमर तोड़ दी
रजगार ने गड्डी रौढ़ दी
हुण ते घर ही औणो हटगी
तायी चाची खाला जी
और सुनाओ लाला जी
इतने घपले इतने घोटाले
खेत खा गये सींचन वाले
नदी नू पूजन वालयाँ दा
नदी ही कर गयी निवाला जी
क्या क्या सुनाएँ लाला जी
बदहाली के गले लिपटकर
ख़ुशहाली की चाल बदल गई
सारे रोवण कर्म आपने
ख़ुद नाल पड़ गया पाला जी
की की सुनाएँ लाला जी
राजा खुद को रब समझता
ओहदे केड़ा रोण नियाणे
बच्चयाँ वाले कुरलोंदे फ़िरदे
हसदा चाय वाला जी
की की सुनाएँ लाला जी
राजविंदर कौर
सितारगंज
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