आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

और सुनाओ लाला जी

                
                                                         
                            कुर्सी डट्ठी आओ बैठो
                                                                 
                            
और सुनाओ लाला जी
चाय चुक्को मूँह नू लाओ
ख़ाली करो प्याला जी

नाती पोते हो गए वड्डे
अपने अपने कम्मी जाँदे
घर पर वेले रहते होगे
जपते होगे माला जी
और सुनाओ लाला जी

और बताओ,फिर रेट बढ़ गए
तेल गैस और खाण पीण के
कैसी रही दीवाली अपनी
या फिर निकला दिवाला जी
और सुणाओ लाला जी

चीनी शक्कर बस में न रही
डायबिक वाली गोली चलती
डेली लगता टीका एक
चाय पीण की चाह ही मुक गयी
दुध नू आया उबाला जी


चारे पासे इक ही रोना
मँहगायी ने कमर तोड़ दी
रजगार ने गड्डी रौढ़ दी
हुण ते घर ही औणो हटगी
तायी चाची खाला जी
और सुनाओ लाला जी

इतने घपले इतने घोटाले
खेत खा गये सींचन वाले
नदी नू पूजन वालयाँ दा
नदी ही कर गयी निवाला जी
क्या क्या सुनाएँ लाला जी

बदहाली के गले लिपटकर
ख़ुशहाली की चाल बदल गई
सारे रोवण कर्म आपने
ख़ुद नाल पड़ गया पाला जी
की की सुनाएँ लाला जी

राजा खुद को रब समझता
ओहदे केड़ा रोण नियाणे
बच्चयाँ वाले कुरलोंदे फ़िरदे
हसदा चाय वाला जी
की की सुनाएँ लाला जी

राजविंदर कौर
सितारगंज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर