" तीज: भोले बाबा की अनोखी बारात "
सज रही पार्वती, जिनके लाने,
वे कैसो रूप बनाए।
भोला आए दक्ष नगरिया,
सब देख-देख थर्राने।
कैसो स्वांग रचो भोले ने,
गले मुण्ड की माला, सर्प रहे सन्नाने।
कोनौ के गले कटे हैं, कोनौ के नइया कान,
जीभ निकारे नाच रहे हैं, भूत प्रेत चिल्लाए।
नगरवाल सब देख रहे हैं, कैसी गजब बरात!
भूत-प्रेत हैं दूल्हा संग, न हाथी,घोड़ा संग साथ।
दूल्हा बैठे नन्दी पर, तन पर भस्म लगाए,
श्रंगी बाँधे कमर में, पहने बाघ की खाल।
मस्तक चन्दा सोहत है, सर पे गंग की धार,
एक हाथ त्रिशूल लिए है, दूजे डमरू साथ—
निराली इनकी चाल-ढाल है, निराले इनके साथ,
जग में सबसे न्यारे लागें, अपने भोलेनाथ!
आगे-आगे भूत नचत हैं, पीछे प्रेत बजाएँ,
कोनौ ढोलक, कोनौ डमरू, अजब सुरों में गाएँ।
कोनहु के तन राख लिपटी है, कोनहु जटा बढ़ाए,
लोगबाग डर के मारे, घर के भीतर घुस जाएँ।
बच्चे डरके माँ से चिपके, बूढ़े आँखें फाड़,
नारी जंगलन से झाँक रही हैं, मन में प्रश्न हजार।
ऐसी बरात न देखी हमने, न दिन में न रात!
भोले बाबा हँसते जाएँ, धुन में अपने मस्त मगन,
संग चले गण सारे उनके, सबके मन में हुडदंग।
पार्वती के द्वारे पहुँची, जब यह निराली टोली,
देख-देख सब दंग रह गए, कैसी भोले की डोली!
जिसको जग ने भूत कहा है, भोले उसके नाथ,
दीन-दुखी सबको अपनावें, सबके सिर पर हाथ।
रूप भले ही भयंकर लागे, मन से भोले भंडारी,
सबके दुख हरने वाले हैं, जग के पालनहारी।
-प्रदीप बाबू
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