परिवार की खुशियों को, स्वार्थ की दीमक खा रही,
रिश्तों की पावन डोर अब, धीरे-धीरे टूटती जा रही।
जहाँ कभी प्रेम महकता था, अब स्वार्थ का पहरा छाया है,
धन-दौलत के मोह ने देखो, अपनों को छुड़वाया है।
एक ही आँगन में रहकर भी, दिलों में दूरी छाई है,
स्वार्थ की अंधी आँधी ने, रिश्तों में आग लगाई है।
माँ की ममता बँटने लगी, पिता का मान घटाया है,
धन-दौलत की चाह ने देखो, भाई से भाई छुड़ाया है।
बूढ़ी आँखें राह निहारें, कोई अपना घर आए,
दो पल बैठ प्रेम से बोले, मन की पीड़ा सहलाए।
जिनकी ख़ातिर उम्र गँवाई, वे ही मुँह अब मोड़ रहे,
जिन हाथों ने राह दिखाई, उनसे नाता तोड़ रहे।
स्वार्थ की दीमक चुपके-चुपके, घर की नींव हिलाती है,
हँसते-खेलते परिवारों में, नफ़रत के बीज बो जाती है।
समय रहते चेतो अपनों को, रिश्तों को मत टूटने दो,
धन के पीछे भाग-भागकर, अपनों को मत छूटने दो।
धन-दौलत सब यहीं रहेगी, साथ न कुछ भी जाएगा,
प्रेम से सींचा हुआ रिश्ता, जीवन भर मुस्काएगा।
स्वार्थ मिटाकर प्रेम जगाओ, घर को फिर परिवार बनाओ,
रूठे मन को गले लगाकर, खुशियों का संसार बसाओ।
त्याग, समर्पण और भरोसे से, रिश्तों का सम्मान रहे,
हर आँगन में प्रेम महकता, अपनों का अभिमान रहे।
-प्रदीप बाबू
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