"रिश्तों की राख में बची राखी"
मेरी बुआ हर सावन में, बिन बुलाये आ जाती है।
जाते ही उनके, घर में कुछ अजब कहानी बन जाती है।
राखी लेकर आई थी वो, मन में ढेरों उमंग लिये,
सोच रही हँसुगी-खुलकर, बचपन की यादों को संग लिये।
अब न आँगन वैसा, न वैसी घर की रौनक थी,
माँ की मीठी डाँट न थी, न बाबुल की वह झलक रही।
भैया अपने रिश्तों में व्यस्त हुए, सब रिश्ते जैसे दूर हुए,
अपने ही घर की चौखट पर, एक बेटी के पग मजबूर हुए।
जिस आँगन में खेली कूदी, आज वहीं पराई थी,
अपनों के बीच खड़ी होकर भी, मन में फिर भी तन्हाई थी।
माँ को फिक्र थी खिलते फूलों की, पर नानी का पद भूल गई,
गई अकेले बाबुल के घर, माँ ये रिश्ता भूल गई।
राखी बाँधी, तिलक लगाया, आँखों में कुछ नीर भरे,
हँसते-हँसते मन ही मन में, कितने सपने चूर हुए।
बोली कुछ भी नहीं किसी से, दर्द सभी मुस्कान में था,
मायके आकर भी एक बहिना का, मन जैसे वीरान में था।
रिश्तों की डोरी मत तोड़ो, मेरा यही उपहार रहे,
हर रक्षाबंधन पर, हर बहिना का मायका खुशहाल रहे।
राखी केवल उत्सव नहीं, विश्वास का मान है,
बहन के स्नेह और भाई के सम्मान का गान है।
जब तक धड़कनों में अपनापन जीवित रहेगा,
तब तक यह पावन बन्धन अमर रहेगा॥
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