" जितनी चादर, उतने पैर "
जहाँ तक संभव हो सके, कम से कम उधार लो,
जितनी अपनी चादर हो, उतने ही पैर पसार लो।
कम पैसों में जीने की, खुद में आदत डाल लो,
झूठी शान और दिखावे को, जीवन से निकाल दो।
इच्छाओं पर संयम रखकर, जीवन को सँवार लो,
सुख-चैन से जीना है तो, कर्ज़ से किनारा कर लो।
वरना ऋण चुकाते-चुकाते, सारी उम्र गुज़ार दोगे,
चंद दिनों की खुशियों पर, जीवन भर का सुख वार दोगे।
माँ-बाप के ऋण क्या कम हैं, जो दुनिया का ऋण स्वीकार लो,
सारी उम्र कर्ज़ चुकाने में, क्यों अपना जीवन वार दो?
पति-पत्नी और अपनों के भी, कितने ही उपकार हैं,
इन रिश्तों के ऋण के आगे, सारी धन-दौलत बेकार है।
इनका ऋण चुकाने में भी, जीवन कम पड़ जाएगा,
फिर कर्ज़ के बोझ तले क्यों, सारा जीवन दब जाएगा?
संतोषी बनकर जीना सीखो, इच्छाओं पर लगाम डाल लो,
जितनी अपनी चादर हो, उतने ही पैर पसार लो।
-प्रदीप बाबू
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X