मेरे मरने के वक्त आस-पास मेला-सा हो,
मिलने मुझसे दोस्त-रिश्तेदार सब लोग आएं,
कुछ दिनों तक तो रोएं सब मिलकर,
कुछ दिनों तक तो चूल्हे वहाँ न जल पाएं।
मेरे बाद कुछ दिनों तक कोई त्योहार न हो,
कुछ तय आयोजन टलें, श्रृंगार न हों,
लिपट कर रोएं मुझसे विदा होते समय सब,
कमरे से सामान हटाने को कोई तैयारी न हो।
मेरी चिता जलाने पूरा कुनवा-समाज ही आए,
नदी नहीं, सिर्फ़ गंगा में मेरी राख बहायी जाए,
नित पाठ हो घर पर, बिना नमक का भोजन हो,
बच्चे ज़मीन पर ही सोएं, जब तक न तेरहवीं जाए।
यह नहीं कि सुकून होगा मुझे इससे कोई,
पता नहीं मुझे क्या-क्या पता चलेगा तब,
पर देखेंगे बच्चे कि घर जुड़ता कैसे है,
कि घर साथ रोता है, कोई विदा होता है जब।
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