कई महीनों से
बिस्तर पर बीमार
माँ की
पथराई नम आँखें
सहसा मुझे देख चमक उठती हैं
मुझे लगता है मुझे पहचान रही हैं!
मैं बेतहाशा चूमती हूँ उसे,
तो बच्चों जैसी मासूम मुस्कान
खिल पड़ती है
उसके निष्कपट चेहरे पर
ज्यों किसी अंजान को
रास्ते पर मिल जाने पर
होती है हमारे चेहरे पर
अजनबियत वाली
फिर भी
जानी- पहचानी
बेमतलब की मुस्कान
जो रात की अकेलाई में
रूला देती है मुझे ...
उसके
ख़ामोश- कंपकंपाते होंठ
डबडबाई आँखें
मानो
ख़ामोशी से कह रही हों
मुझे जीने दो....
या
मुझे जाने दो.......???
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