हम तुम्हारे लिए ज्ञान की राह पर,
दीप सदियों से ऐसे जलाते रहे।
तुम भटकते रहे जग के बाज़ार में,
हम तुम्हें 'संहिता' में बुलाते रहे।।
शास्त्र की बातें पन्नों में ही रह गईं,
रील्स के शौक में ज़िंदगी बह गई।
जो धरोहर तुम्हें सौंपनी थी हमें,
बात वो आँखों-आँखों में ही रह गई।
इस दिखावे की दुनिया में तुम खो गए,
हम तुम्हें सत्य का सच बताते रहे...
तुम भुलाते रहे वेद के सार को,
हम तुम्हें 'संहिता' में बुलाते रहे।।
रोग की जड़ को समझे बिना ही चले,
नाम आधुनिकता का ही जपते रहे।
जो दिया था तुम्हें ज्ञान का आचमन,
तुम उसी राह पर यूँ झिझकते रहे।
तुम तो मॉडर्न बनने की होड़ में रहे,
हम तुम्हें 'आयुर्वेद' ही सिखाते रहे...
तुम मिटाते रहे 'हेतु' के भाव को,
हम तुम्हें 'संहिता' में बुलाते रहे।।
छोड़ दो ये चमक, छोड़ दो ये भरम,
शास्त्र का थामो दामन, यही है करम।
मात्र डिग्री नहीं, प्राण का भाव दो,
तब समझ पाओगे वैद्य का सब धरम।
तुम भटकते रहे रोज़ इस भीड़ में,
हम तुम्हें राह सीधी दिखाते रहे...
तुम बुझाते रहे आस की हर शिखा,
हम तुम्हें 'संहिता' में बुलाते रहे।।
हम तुम्हारे लिए ज्ञान की राह पर,
दीप सदियों से ऐसे जलाते रहे।
तुम भटकते रहे जग के बाज़ार में,
हम तुम्हें 'संहिता' में बुलाते रहे।।
कवि - डॉ विकास चौरसिया
फतेहपुर, उत्तर प्रदेश
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